Monday, July 5, 2021

कुछ प्रचलित न्याय


        कुछ प्रचलित न्याय 

  • (१) अजाकृपाणीय न्याय—कहीं तलवार लटकती थी, नीचे से बकरा गया और वह संयोग से उसकी गर्दन पर गिर पडी़। जहाँ दैवसंयोग से कोई विपत्ति आ पड़ती है वहाँ इसका व्यवहार होता है।
  • (२) अजातपुत्रनामोत्कीर्तन न्याय—अर्थात् पुत्र न होने पर भी नामकरण होने का न्याय। जहाँ कोई बात होने पर भी आशा के सहारे लोग अनेक प्रकार के आयोजन बाँधने लगते हैं वहाँ यह कहा जाता है।
  • (३) अध्यारोप न्याय—जो वस्तु जैसी न हो उसमें वैसे होने का (जैसे रज्जु में सर्प हीने का) आरोप। वेदांत की पुस्तकों में इसका व्यवहार मिलता है।
  • (४) अंधकूपपतन न्याय—किसी भले आदमी ने अंधे को रास्ता बतला दिया और वह चला, पर जाते जाते कूएँ में गिर पडा़। जब किसी अनधिकारी को कोई उपदेश दिया जाता है और वह उसपर चलकर अपने अज्ञान आदि के कारण चूक जाता है या अपनी हानि कर बैठता है तब यह कहा जाता है।
  • (५) अंधगज न्याय—कई जन्मांधों ने हाथी कैसा होता है यह देखने के लिये हाथी को टठोला। जिसने जो अंग टटोल पाया उसने हाथी का आकार उसी अंग का सा समझा। जिसने पूँछ टटोली उसने रस्सी के आकार का, जिसने पैर टटोला उसने खंभे के आकार रस्सी के आकार का, जिसने पैर टटोला उसने खंभे के आकार का समझा। किसी विषय के पुर्ण अंग का ज्ञान न होने पर उसके संबंध में जब अपनी अपनी समझ के अनुसार भिन्न भिन्न बाते कही जाती हैं तब इस उक्ति का प्रयोग करते हैं।
  • (६) अंधगोलांगूल न्याय—एक अंधा अपने घर के रास्ते से भटक गया था। किसी ने उसके हाथ में गाय की पूँछ पकडा़कर कह दिया कि यह तुम्हें तुम्हारे स्थान पर पहुँचा देगी। गाय के इधर उधर दौड़ने से अंधा अपने घर तो पहुँचा नहीं, कष्ट उसने भले ही पाया। किसी दुष्ट या मूर्ख के उपदेश पर काम करके जब कोई कष्ट या दुःख उठाता है तब यह कहा जाता है।
  • (७) अंधचटक न्याय—अंधे के हाथ बटेर।
  • (८) अंधपरंपरा न्याय—जब कोई पुरुष किसी को कोई काम करते देखकर आप भी वही काम करने लगे तब वहाँ यह कहा जाता है।
  • (९) अंधपंगु न्याय—एक ही स्थान पर जानेवाला एक अंधा और एक लँगडा़ यदि मिल जायँ तो एक दुसरे की सहायता से दोनों वहाँ पहुँच सकते हैं। सांख्य में जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष के संयोग से सृष्टि होने के दृष्टांत में यह उक्ति कही गई है।
  • (१०) अपवाद न्याय—जिस प्रकार किसी वस्तु के संबंध में ज्ञान हो जाने से भ्रम नहीं रह जाता उसी प्रकार। (वेदांत)।
  • (११) अपराह्नच्छाया न्याय— जिस प्रकार दोपहर की छाया बराबर बढती जाती है उसी प्रकार सज्जनों की प्रीति आदि के संबंध में यह न्याय कहा जाता है।
  • (१२) अपसारिताग्रिभूतल न्याय— जमीन पर से आग हटा लेने पर भी जिस प्रकार कुछ देर तक जमीन गरम रहतौ है उसी प्रकार धनी धन के न रह जाने पर भी कृछ दिनों तक अपनी अकड रखता है।
  • (१३) अरण्यरोदन न्याय— जंगल में रोने के समान बात। जहाँ कहने पर कोई ध्यान देनेवाला न हो वहाँ इसका प्रयोग होता है।
  • (१४) अर्कमधु न्याय— यदि मदार से ही मधु मिल जाय तो उसके लिये अधिक परिश्रम व्यर्थ है। जो कार्य सहज में हो उसके लिये इधर उधर वहूत श्रम करने की आवश्यकता नहीं।
  • (१५) अर्द्धजरतीय न्याय— एर ब्राह्मण देवता अर्थकष्ट से दुःख हो नित्य अपनी गाय लेकर बाजार में बेचने जाते पर वह न बिकती। बात यह थई कि अवस्था पूछने पर वे उसकी बहुत अवस्था बतलाते थे। एक दिन एक आदमी ने उनेस न बिकने का कारण पूछा। ब्राह्णण ने कहा जिस प्रकार आदमी की अवस्था अधिक होने पर उसकी कदर बढ जाती है उसी प्रकार मैंने गाय के संबंध में भी समझा था। उसने आगे ऐसा न कहने की सलाह दी। ब्राह्मण ने कोचा कि एक बार गाय को बुड्ढी कहकर अब फिर जवान कैसे कहूँ। अंत में उन्होंने स्थिर किया कि आत्मा तो बुड्ढी होती नहीं देह बुड्ढी होती है। अतः इसे मैं 'आधी बुड्ढी आधी जवान' कहूँगा। जब किसी की कोई बात इस पक्ष में भई और उस पक्ष में भी हो तब यह उक्ति कही जाती है।
  • (१६) अशोकवनिका न्याय— अशोक बन में जाने के समान (जहाँ छाया सौरम आदि सब कुछ प्राप्त हो)। चब किसी एक ही स्थान परसब कुछ प्राप्त हो लाय और कहीं जाने की आवश्यकता न हो तब यह कहा जाता है।
  • (१७) अश्मलोष्ट न्याय— अर्थात् तराजू पर रखने के लिये पत्थर तो ढेले से भी भारी है। यह विषमता सूचित करने के अवसर पर ही कहा जाता है। जहाँ दो वस्तुओं में सापेक्षिकता सूचित करनी होती है। वहाँ 'पाषाणेष्टिक न्याय' कह जाता है।
  • (१८) अस्नेहदीप न्याय— बिना तेल के दीये की सी बात। थोडे ही काल रहनेवाली बात देखकर यड कहा जाता है।
  • (१९) अस्नेहदप न्याय— साँप के कुंडल मारकर बैठने के समान। किसी स्बाभाविक बात पर।
  • (२०) अहि नकुल न्याय— साँप नेवले के समान। स्वाभाविक विरोध या बैर सूचित करने के लिये।
  • (२१) आकाशापरिच्छिन्नत्व न्याय— आकाश के समान अपरिच्छिन्न।
  • (२२) आभ्राणक न्याय—लोकप्रवाद के समान।
  • (२३) आम्रवण न्याय—जिस प्रकार किसी वन में यदि आम के पेड़ अधिक होते हैं तो उसे 'आम का वन' ही कहते हैं, यद्यपि और भी पेड़ उस वन में रहते हैं, उसी प्रकार जहाँ औरों को छोड़ प्रधान वस्तु का ही उल्लेख किया जाता है वहाँ यह उक्ति कही जाती है।
  • (२४) उत्पाटितदतनाग न्याय—दाँत तोडे़ हुए साँप के समान। कुछ करने धरने या हानि पहुँचाने में असमर्थ हुए मनुष्य के संबंध में।
  • (२५) उदकनिमज्जन न्याय—कोई दोषी है या निर्दोष इसकी एक दिव्य परीक्षा प्राचीन काल में प्रचलित थी। दोषी को पानी में खडा़ करके किसी ओर बाणा छोड़ते थे और बाण छोड़ने के साथ ही अभियुक्त को तबतक डूवे रहने के लिये कहते थे जबतक वह छोडा़ हुआ बाण वहाँ से फिर छूटने पर लौट न आवे। यदि इतने बीच में डूबनेवाले का कोई अंग बाहर न दिखाई पडा़ तो उसे निर्देष समझते थे। जाहाँ सत्या- स्तय की बात आती है वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (२६) उभयतः पाशरज्जु न्याय—जहाँ दोनों ओर विपत्ति हो अर्थात् दो कर्तव्यपक्षों में से प्रत्येक में दुःख हो वहाँ इसका व्यवहार होता है। 'साँप छछूँदर की गति'।
  • (२७) उष्टूकंटक भक्षण न्याय—जिस प्रकार थोडे़ से सुख के लिये ऊँट काँटे खाने का कष्ट उठाता है उसी प्रकार जहाँ थोडे़ से सुख के लिये अधिक कष्ट उठाया जाता है वहाँ यह कहावत कही जाती है।
  • (२८) ऊपरवृष्टि न्याय—किसी बात का जहाँ कोई फल न हो वहाँ कहा जाता है।
  • (२९) कंठचामीकर न्याय—गले में सोने का हार हो और उसे इधर उधर ढूढ़ँता फिरे। आनंदस्वरूप ब्रह्म के अपने में रहते भी अज्ञानवश सुख के लिये अनेक प्रकार के दुःख भोगने के दृष्टांत में वेदांती कहते हैं।
  • (३०) कदंबगोलक न्याय—जिस प्रकार कदंब के गोले में सब फूल एक साथ हो जाते हैं, उसी प्रकार जहाँ कई बातें एक साथ हो जाती हैं वहाँ इसे कहते हैं। कुछ नैयायिक शब्दो- त्पत्ति में कई वर्णों के उच्चारण एक साथ मानकर उसके दृष्टांत में यह कहते हैं। यह भी कहते हैं कि जिस प्रकार कदंब में सब तरफ किजल्क होते हैं वैसे सब्द जहाँ उत्पन्न होता है उसके सभी ओर उसकी तरंगों का प्रसार होता है।
  • (३१) कदलीफल न्याय—केला काटने पर ही फलता है इसी प्रकार नीच सीधे कहने से नहीं सुनते।
  • (३२) कफोनिगुड न्याय—सूत न कपास जुलाहों से मटकौवल।
  • (३३) करकंकण न्याय—'कंकण' कहने से ही हाथ के गहने का बोध हो जाता है, 'कर' कहने की आवश्यकता नहीं। पर कर कंकण कहते हैं जिसका अर्थ होता है 'हाथ में पडा़ हुआ कडा़'। इस प्रकार का जहाँ अभिप्राय होता है वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (३४) काकतालीय न्याय—किसी ताड़ के पेड़ के नीचे कोई पथिक लेटा था और ऊपर एक कौवा बैठा था। कौवा किसी ओरको उडा़ और उसके उड़ने के साथ ही ताड़ का एक पका हुआ फल नीचे गिरा। यद्यपि फल पककर आपसे आप गिरा था तथापि पथिक ने दोनों बातों को साथ होते देख यही समझा कि कौवे के उड़ने से ही तालफल गिरा। जहाँ दो बातें संयोग से इस प्रकार एक साथ हो जाती हैं वहाँ उनमें परस्पर कोई संबंध न होते दुए भी लोग संबंध समझ लेते हैं। ऐसा संयोग होने पर यह कहावत कही जाती है।
  • (३५) काकदध्युपघातक न्याय—'कौवे से दही बचाना' कहने से जिस प्रकार 'कुत्ते, बिल्ली आदि सब जंतुओं से बचाना' समझ लिया जाता है उसी प्रकार जहाँ किसी वाक्य का अभिप्राय होता है वहाँ यह उक्ति कहीं जाती है।
  • (३६) काकदंतगवेषण न्याय—कौवे का दाँत ढूँढ़ना निष्फल है अतः निष्फल प्रयत्न के संबंध में यह न्याय कहा जाता है।
  • (३७) काकाक्षिगोलक न्याय—कहते हैं, कौवे के एक ही पुतली होती है जो प्रयोजन के अनुसार कभी इस आँख में कभी उस आँख में जाती है। जहाँ एक ही वस्तु दो स्थानों में कार्य करे वहाँ के लिये यह कहावत है।
  • (३८) कारणगुणप्रक्रम न्याय—कारण का गुण कार्य में भी पाया जाता है। जैसे सूत का रूप आदि उससे बुने कपडे़ में।
  • (३९) कुशकाशावलंबन न्याय—जैसे डूबता हुआ आदमी कुश काँस जो कुछ पाता है उसी को सहारे के लिये पकड़ता है, उसी प्रकार जहाँ कोई दृढ़ आधार न मिलने पर लोग इधर उधर की बातों का सहारा लेते हैं वहाँ के लिये यह कहावत है। 'डूबते को तिनके का सहारा' बोलते भी हैं।
  • (४०) कूपखानक न्याय—जैसे कूआँ खोदनेवाले की देह में लगा हुआ कीचड़ उसी कूएँ के जल में साफ हो जाता है उसी प्रकार राम, कृष्ण आदि को भिन्न भिन्न रूपों में समझने से ईश्वर में भेद बुद्धि का जो देष लगता है वह उन्हीं की उपासना द्वारा ही अद्वैतबुद्धि हो जाने पर मिट जाता है।
  • (४१) कूपमंडूक न्याय—समुद्र का मेढक किसी कूएँ में जा पडा़। कूएँ कै मेढक ने पूछा 'भाई ! तुम्हारा समुद्र कितना बडा़ है।' उसने कहा 'बहुत बडा़'। कूएँ के मेढक ने पूछा 'इस कूएँ के इतना बडा़'। समुद्र के मेढक ने कहा 'कहाँ कूआँ, कहाँ समुद्र'। समुद्र से बडी़ कोई वस्तु पृथ्वी पर नहीं। इसपर कूएँ का मेढक जो कूएँ से बडी़ कोई वस्तु जानता ही न था बिगड़कर बोला 'तुम झूठे हो, कूएँ से बडी़ कोई वस्तु हो नहीं सकती'। जहाँ परिमित ज्ञान के कारण कोई अपनी जानकारी के ऊपर कोई दूसरी बात मानता ही नहीं वहाँ के लिये यह उक्ति है।
  • (४२) कूर्माग न्याय—जिस प्रकार कछुआ जब चाहता है तब अपने सब अंग भीतर समेट लेता है और जब चाहता है बाहर करता है उसी प्रकार ईश्वर सृष्टि और लय करता है।
  • (४३) कैमुतिक न्याय—जिसने बडे़ बडे़ काम किए उसे कोई छोटा काम करते क्या लगता है। उसी के दृष्टांत के लिये यह उक्ति कही जाती है
  • (४४) कौंडिन्य न्याय—यह अच्छा है पर ऐसा होता तो और भी अच्छा होता।
  • (४५) गजभुक्त कपित्थ न्याय—हाथी कै खाए हुए कैथ के समान ऊपर से देखने में ठीक पर भीतर भीतर निःसार और शून्य।
  • (४६) गडुलिकाप्रवाह न्याय—भेडिया धसान।
  • (४७) गणपति न्याय—एक बार देवताओं में विवाद चला कि सबमें पूज्य कौन है। ब्रह्मा ने कहा जो पृथ्वी की प्रदक्षिणा पहले कर आवे वही श्रेष्ठ समझा जाय। सब देवता अपने अपने वाहनों पर चले। गणेश जी चूहे पर सवार सबके पीछे रहे। इतने में मिले नारद। उन्होंनें गणेश जी को युक्ति बताई कि राम नाम लिखकर उसी की प्रदक्षिणा करके चटपट ब्रह्मा के पास पहुँच जाओ। गणपति ने ऐसा ही किया और देवताओं में वे प्रथम पूज्य हुए। इसी से जहाँ थोडी़ सी युक्ति से बडी़ भारी बात हो जाय वहाँ इसका प्रयोग करते हैं।
  • (४८) गतानुगतिक न्याय—कुछ ब्राह्मण एक घाट पर तर्पण किया करते थे। वे अपना अपना कुश एक ही स्थान पर रख देते थे जिससे एक का कुश दूसरा ले लेता था। एक दिन पहचान के लिये एक ने अपने कुश को ईँट से दबा दिया। उसकी देखा देखी दूसरे दिन सबने अपने कुश पर ईंट रखी। जहाँ एक की देखादेखी लोग कोई काम करने लगते हैं वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (४९) गुड़जिह्विका न्याय—जिस प्रकार बच्चे को कड़वी औषध खिलाने के लिये उसे पहले गुड़ देकर फुसलाते हैं उसी प्रकार जहाँ अरुचिकर या कठिन काम कराने के लिये पहले कुछ प्रलोभन दिया जाता है वहाँ इस उक्ति का प्रयोग होता है।
  • (५०) गोवलीरवर्द न्याय—'वलीवर्द' शब्द का अर्थ है बैल। जहाँ यह शब्द गो के साथ हो वहाँ अर्थ और भी जल्दी खुल जाता है। ऐसे शब्द जहाँ एक साथ होते हैं वहाँ के लिये यह कहावत है।
  • (५१) घट्टकुटीप्राभात न्याय—एक बनिया घाट के महसूल से बचने के लिये ठीक रास्ता छोड़ ऊबड़खाबड़ स्थानों में रातभर भटकता रहा पर सबेरा होते होते फिर उसी महसूल की छावनी पर पहुँचा और उसे महसूल देना पडा़। जहाँ एक कठिनाई से बचने के लिये अनेक उपाय निष्फल हों और अंत में उसी कठिनाई में फँसना पडे़ वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (५२) घटप्रदीप न्याय—धडा़ अपने भीतर रखे हुए दीप का प्रकाश बाहर नहीं जाने देता। जहाँ कोई अपना ही भला चाहता है दूसरे का उपकार नहीं करता यहाँ यह प्रयुक्त होता है।
  • (५३) घुणाक्षर न्याय—घुनों के चालने से लकडी़ में अक्षरों के से आकार बन जाते हैं, यद्यपि घुन इन उद्देश्य से नहीं काटते कि अक्षर बनें। इसी प्रकार जहाँ एक काम करने में कोई दूसरी बात अनायस हो जाय वहाँ यह कहा जाता है।
  • (५४) चंपकपटवास न्याय—जिस कपडे़ में चंपे का फूल रखा होउसमें फूलों के न रहने पर भी बहुत देर तक महँक रहती है। इसी प्रकार विषय भोग का संस्कार भी बहुत काल तक बना रहता है।
  • (५५) जलतरंग न्याय—अलग नाम रहने पर भी तरंग जल से भिन्न गुण की नहीं होती। ऐसा ही अभेद सूचित करने के लिये इस उक्ति का व्यवहार होता है।
  • (५६) जलतुंबिका न्याय—(क) तूँबी पानी में नहीं डूबती, डुबाने से ऊपर आ जाती है। जहाँ कोई बात छिपाने से छिपनेवाली नहीं होती वहाँ इसे कहते हैं। (ख) तूँबी के ऊपर मिट्टी कीचड़ आदि लपेटकर उसे पानी में डाले तो वह डूब जाती है पर कीजड़ धोकर पानी में डालें तो नहीं डूबती। इसी प्रकार जीव देहादि के नलों से युक्त रहने पर संसार सागर में निमग्न हो जाता है और मल आदि छूटने पर पार हो जाता है।
  • (५७) जलानयन न्याय—पानी 'लाओं' कहने से उसकै साथ बरतन का लाना भी समझ लिया जाता है क्योंकि बरतन के बिना पानी आवेगा किसमें।
  • (५८) तिलतंडुल न्याय—चावल और तिल की तरह मिली रहने पर भी अलग दिखाई देनेवाली वस्तुओं के संबंध में इसका प्रयोग होता है।
  • (५९) तृणजलौका न्याय—दे०'तृणजलौका' शब्द।
  • (६०) दंडचक्र न्याय—जैसे घडा़ बनने में दंड, चक्र आदि कई कारण हैं वैसे ही जहाँ कोई बात अनेक कारणों से होती है वहाँ यह उक्ति कही जाती है।
  • (६१) दंडापूप न्याय—कोई डंडे में बँधे हुए मालपूए छोड़कर कहीं गया। आने पर उसने देखा कि डंडे का बहुत सा भाग चूहे खा गए हैं। उसने सोचा कि जब चूहे डंडा तक खा गए तब मालपूए को उन्होंने कब छोडा़ होगा। जब कोई दुष्कर और कष्टसाध्य कार्य हो जाता है तब उसके साथ ही लगा हुआ सुखद और सहज कार्य अवश्य ही हुआ होगा यही सूचित करने के लिये यह कहावत कहते हैं।
  • (६२) दशम न्याय—दस आदमी एक साथ कोई नदी तैरकर पार गए। पार जाकर वे यह देखने के लिये सबको गिनने लगे कि कोई छूटा या वह तो नहीं गया। पर जो गिनता वह अपने को छोड़ देता इससे गिनने में नौ ही ठहरते। अंत में उस एक खोए हुए के लिये सबने रोना शुरू किया। एक चतुर पथिक ने आकर उनसे फिर से गिनने के लिये कहा। जब एक उठकर नौ तक गिन गया तब पथिक ने कहा 'दसवें तुम'। इसपर सब प्रसन्न हो गए। वेदांती इस न्याय का प्रयोग यह दिखाने के लिये करते हैं कि गुरु के 'तत्वमसि' आदि उपदेश सुनने पर अज्ञान और तज्जनित दुःख दूर हो जाता है।
  • (६३) देहलीदीपक न्याय—देहली पर दीपक रखने से भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला रहता है। जहाँ एक ही आयोजन से दो काम सधें या एक शब्द या बात दोनों ओर लगे वहाँ इस न्याय का प्रयोग होता है।
  • (६४) नष्टाश्वरदग्धरथ न्याय—संस्कृत शास्त्रों में प्रसिद्ध एक न्याय जिसका तात्पर्य है, दो आदमियों का इस प्रकार मिलकर काम करना जिसमें दोनों एके दूसरे की चीजों का उपयोग करके अपना उद्देश्य सिद्ध करें। यह न्याय निम्नलिखित घटना या कहानी के आधार पर है। दो आदमी अलग अलग रथ पर सवार होकर किसी वन में गए। वहाँ संयोगवश आग लगने के कारण एक आदमी का रथ जल गया और दूसरे का घोडा़ जल गया। कुछ समय के उपरांत जब दोनों मिले तब एक के पास केवल घोडा़ और दूसरे के पास केवल रथ था। उस समय दोनों ने मिलकर एक दूसरे की चीज का उपयोग किया। घोडा़ रथ में जोता गया और वे दोनों निर्दिष्ट स्थान तक पहुँच गए। दोनों ने मिलकर काम चला लिया। इस प्रकार जहाँ दो आदमी मिलकर एक दूसरे की त्रुटि की पूर्ति करके काम चलाते हैं वहाँ इसे कहते हैं।
  • (६५) नारिकेलफलांबु न्याय—नारिकेल के फल में जिस प्रकार न जाने कहाँ से कैसे जल आ जाता है उसी प्रकार लक्ष्मी किस प्रकार आती है नहीं जान पड़ता।
  • (६६) निम्नगाप्रवाह न्याय—नदी का प्रवाह जिस ओर को जाता है उधर रुक नहीं सकता। इसी प्रकार के अनिवार्य क्रम के दृष्टांत में यह कहावत है।
  • (६७) नृपनापितपुत्र न्याय—किसी राजा के यहाँ एक नाई नौकर था। एक दिन राजा ने उससे कहा कि कहीं से सबसे सुंदर बालक लाकर मुझे दिखाओ। नाई को अपने पुत्र से बढ़कर और कोई सुंदर बालक कहीं न दिखाई पडा़ और वह उसी को लेकर राजा के सामने आया। राजा उस काले कलूटे बालक को देख बहुत क्रुद्ध हुआ, पर पीछे उसने सोचा कि प्रेम या राग के वश इसे अपने लड़के सा सुंदर और कोई दिखाई ही न पडा़। राग के वश जहाँ मनुष्य अंधा हो जाता है और उसे अच्छे बुरे की पहचान नहीं रह जाती वहाँ इस न्याय का प्रयोग होता है।
  • (६८) पंकप्रक्षालन न्याय—कीचड़ लग जायगा तो धो डालेंगे इसकी अपेक्षा यही विचार अच्छा है कि कीचड़ लगने ही न पावे।
  • (६९) पंजरचालन न्याय—दस पक्षी यदि किसी पिंजडे़ में बंद कर दिए जायँ और वे सब एक साथ यत्न करें तो पिजडे़ को इधर उधर चला सकते हैं। दस ज्ञानेद्रियाँ और दस कमेंद्रियाँ प्राणरूप क्रिया उत्पन्न करके देह को चलाती हैं इसी के दृष्टांत में साख्यवाले उक्त न्याय करते हैं।
  • (७०) पाषाणेष्टक न्याय—ईट भारी होती है पर उससे भी भारी पत्थर होता है।
  • (७१) पिष्टपेषण न्याय—पीसे को पीसना निरर्थंक है। किए हुए काम को व्यर्थ जहाँ कोई फिर करता है वहाँ के लिये यह उक्ति है।
  • (७२) प्रदीप न्याय—जिस प्रकार तेल, बत्ती और आग इन भिन्न भिन्न वस्तुओं के मेल से दीपक जलता है उसी प्रकार सत्व, रज और तम इन परस्पर भिन्न गुणों के सहयोग से देह- धारण का व्यापार होता है। (सांख्य)।
  • (७३) प्रापाणक न्याय—जिस प्रकार घी, चीनी आदि कई वस्तुओं के एकत्र करने से बढ़िया मिठाई बनती है उसी प्रकार अनेक उपादानों के योग से सुंदर वस्तु तैयार होने के दृष्टांत में यह उक्ति कही जाती है। साहित्यवाले विभाव, अनुभाव आदि द्वारा रस का परिपाक सूचित करने के लिये इसका प्रयोग प्रायः करते हैं।
  • (७४) प्रासादवासि न्याय—महल में रहनेवाला यद्यपि कामकाज के लिये नीचे उतरकर बाहर इधर उधर भी जाता है पर उसे प्रसादवासी ही कहते है इसी प्रकार जहाँ जिस विषय की प्रधानता होती है वहाँ उसी का उल्लेख होता है।
  • (७५) फलवत्सहकार न्याय—आम के पेड़ के नीचे पथिक छाया के लिये ही जाता है पर उसे फल भी मिल जाता है। इसी प्रकार जहाँ एक लाभ होने से दूसरा लाभ भी हो वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (७६) बहुवृकाकृष्ट न्याय—एक हिरन को यदि बहुत से भेड़िए लगें तो उसके अंग एक स्थान पर नहीं रह सकते। जहाँ किसी वस्तु के लिये बहुत से लोग खींचाखींची करते हैं वहाँ वह यथास्थान वा समूची नहीं रह सकती।
  • (७७) विलवर्तिगोधा न्याय—जिस प्रकार बिल में स्थित गोह का विभाग आदि नहीं हो सकता उसी प्रकार जो वस्तु अज्ञात है उसके संबंध में भला बुरा कुछ नहीं कहा जा सकता।
  • (७८) ब्राह्मणग्राम न्याय—जिस ग्राम में ब्राह्मणों की बस्ती अधिक होती है उसे ब्राह्मणों का गाँव करते है यद्यपि उसमें कुछ और लोग भी बसते हैं। औरों को छोड़ प्रधान वस्तु का ही नाम लिया जाता है, यही सूचित करने के लिये यह कहावत है।
  • (७९) ब्राह्मणअमण न्याय—ब्राह्मण यदि अपना धर्म छोड़ श्रमण (बौद्ध भिक्षुक) भी हो जाता है तब भी उसे ब्रह्मण श्रमण कहते हैं। एक वृत्ति को छोड़ जब कोई दूसरी वृत्ति ग्रहण करता है तब भी लोग उसकी पूर्ववृत्ति का निर्देश करते हैं।
  • (८०) मज्जनोन्मज्जन न्याय—तैरना न जाननेवाला जिस प्रकार जल में पड़कर डूबता उतरता है उसी प्रकार मूर्ख या दुष्ट वादी प्रमाण आदि ठीक न दे सकने के कारण क्षुब्ध ओर व्याकुल होता है।
  • (८१) मंडूकतोलन न्याय—एक धूर्त बनिया तराजू पर सौदे के साथ मेढक रखकर तौला करता था। एक दिन मेढक कूदकर भागा और वह पकडा़ गया। छिपाकर की हुई बुराई का भडा एक दिन फूटता है।
  • (८२) रज्जुसर्प न्याय—जबतक दृष्टि ठीक नहीं पड़ती तबतक मनुष्य रस्सी को साँप समझता है इसी प्रकार जबतक ब्रह्मज्ञान नहीं होता तबतक मनुष्य दुश्य जगत् को सत्य समझता है, पीछे ब्रह्मज्ञान होने पर उसका भ्रम दूर होता है और वह समझता है कि ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। (वेदांती)।
  • (८३) राजपुत्रव्याध न्याय—कोई राजपुत्र बचपन में एक ब्याध के घर पड़ गया और वहीं पलकर अपने को व्याधपुत्र ही समझने लगा। पीछे जब लोगों ने उसे उसका कुल बताया तब उसे अपना ठीक ठीक ज्ञान हुआ। इसी प्रकार जबतक ब्रह्मज्ञान नहीं होता तबतक मनुष्य अपने को न जाने क्या समझा करता है। ब्रह्मज्ञान हो जाने पर वह समझता है कि 'में ब्रह्म हूँ'। (वेदांती)।
  • (८४) राजपुरप्रवेश न्याय—राजा के द्वार पर जिस प्रकार बहुत से लोगों की भीड़ रहती है पर सब लोग बिना गड़बड़ या हल्ला किए चुपचाप कायदे से खडे़ रहते हैं उसी प्रकार जहाँ सुव्यवस्थापूर्वक कार्य होता है वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (८५) रात्रिदिवस न्याय—रात दिन का फर्क। भारी फर्क।
  • (८६) लूतातंतु न्याय—जिस प्रकार मकडी़ अपने शरीर से ही सूत निकालकर जाला बनाती है और फिर आप ही उसका संहार करती है इसी प्रकार ब्रह्म अपने से ही सृष्टि करता है और अपने में उसे लय करता है।
  • (८७) लोष्ट्रलगुड न्याय—ढेला तोड़ने के लिये जैसे डंडा होता है उसी प्रकार जहाँ एक का दमन करनेवाला दूसरा होता है वहाँ यह कहावत कही जाती है।
  • (८८) लोह चुंबक न्याय—लोहा गतिहीन और निष्क्रिय होने पर भी चुंबक के आकर्षण से उसके पास जाता है उसी प्रकार पुरुष निष्क्रिय होने पर भी प्रकृति के साहचर्य से क्रिया में तत्पर होता है। (सांख्य)।
  • (८९) वरगोष्ठी न्याय—जिस प्रकार वरपक्ष और कन्यापक्ष के लोग मिलकर विवाह रूप एक ऐसे कार्य का साधन करते हैं जिससे दोनों का अभीष्ट सिद्ध होता है उसी प्रकार जहाँ कई लोग मिलकर सबके हित का कोई काम करते हैं वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (९०) वह्निधूम न्याय—धूमरूप कार्य देखकर जिस प्रकार कारण रूप अग्नि का ज्ञान होता है उसी प्रकार कार्य द्वारा कारण अनुमान के संबंध में यह उक्ति है (नैयायिक)।
  • (९१) विल्वखल्लाट (खल्वाट) न्याय—धूप से व्याकुल गंजा छाया के लिये बेल के पेड़ के नीचे गया। वहाँ उसके सिर पर एक बेल टूटकर गिरा। जहाँ इष्टसाध्न के प्रयत्न में अनिष्ट होता है वहाँ यह उक्ति कही जाती है।
  • (९२) विषवृक्ष न्याय—विष का पेड़ लगाकर भी कोई उसे अपने हाथ से नहीं काटता। अपनी पाली पोसी वस्तु का कोई अपने हाथ से नाश नहीं करता।
  • (९३) वीचितरंग न्याय—एक के उपरांत दूसरी, इस क्रम से बरा- बर आनेवाली तरंगों के समान। नैयायिक ककारादि वर्णों की उत्पत्ति वीचितरंग न्याय से मानते हैं।
  • (९४) वीजांकुर न्याय—बीज से अंकुर या अंकुर से बीज है यह ठीक नहीं कहा जा सकता। न बीज के बिना अंकुर हो सकता है न अंकुर के बिना। बीज और अंकुर का प्रवाह अनादि काल से चला आता है। दो संबद्ध वस्तुओं के नित्य प्रवाह के दृष्टांत में वेदांती इस न्याय को कहते हैं।
  • (९५) वृक्षप्रकंपन न्याय—एक आदमी पेड़ पर चढा़। नीचे से एक ने कहा कि यह डाल हिलाओ, दुसरे ने काहा यह डाल हिलाओ। पेड़ पर चढा़ हुआ आदमी कुछ स्थिर न कर सका कि किस डाल को हिलाऊँ। इतने में एक आदमी ने पेड़ का धड़ ही पकड़कर हिला डाला जिससे सब डालें हिल गई। जहाँ कोई एक बात सबके अनुकूल हो जाती है वहाँ इसका प्रयोग होता है।
  • (९६) वृद्धकुमारिका न्याय या वृद्धकुमारी वाक्य न्याय— कोई कुमारी तप करतो करती बुड्ढी हो गई। इंद्रो ने उससे कोई एक वर माँगने के लिये कहा। उसने वर माँगा कि मेरे बहुत से पुत्र सोने के बरतनों में खूब धी दूध और अन्न खायँ। इस प्रकार उसने एक ही वाक्य में पति, पुत्र गोधन धान्य सब कुछ माँग लिया। जहाँ एक की प्राप्ति से सब कुछ प्राप्त हो वहाँ यह कहावत कही जाती है।
  • (९७) शतपत्रभेद न्याय—सौ पत्ते एक साथ रखकर छेदने से जान पड़ता हैं कि सब एक साथ एक काल में ही छिद गए पर वास्तव में एक एक पत्ता भिन्न भिन्न समय में छिदा। कालांतर की सूक्ष्मता के कारण इसका ज्ञान नहीं हुआ। इस प्रकार जहाँ बहुत से कार्य भिन्न भिन्न समयों में होते हुए भी एक ही समय में हुए जान पड़ते हैं वहाँ यह दृष्टांत वाक्य कहा जाता है। (सांख्य)।
  • (९८) श्यामरक्त न्याय—जिस प्रकार कच्चा काला धडा़ पकने पर अपना श्याम गुण छोड़ कर रक्तगुण धारण करता है उसी प्रकार पूर्व गुण का नाश और अपर गुण का धारण सूचित करने के लिये यह उक्ति कही जाती है।
  • (९९) श्यालकशुनक न्याय—किसी ने एक कुत्ता पाला था और उसका नाम अपने साले का नाम रखा था। जब वह कुत्ते का नाम लेकर गालियाँ देता तब उसकी स्त्री अपने भाई का आप- मान समझकर बहुत चिढ़ती। जिस उद्देश्य से कोई बात नहीं की जाती वह यदि उससे हो जाती है तो यह कहावत कही जाती हैं।
  • (१००) संदंशपतित न्याय—सँड़सी जिस प्रकार अपने बीच आई हुई वस्तु के पकड़ती है उसी प्रकार जहाँ पूर्व ओर उत्तर पदार्थ द्वारा मध्यस्थित पदार्थ का ग्रहण होता है वहाँ इस न्याय का व्यवहार होता है।
  • (१०१) समुद्रवृष्टि न्याय—समुद्र में पानी बरसने से जैसे कोई उपकार नहीं होता उसी प्रकार जहाँ जिस बात की कोई आवश्यकता या फल नहीं वहाँ यदि वह की जाती है तो यह उक्ती चरितार्थ की जाती है।
  • (१०२) सर्वापेक्षा न्याय—बहुत से लोगों का जहाँ निमंत्रण होता है वहाँ यदि कोई सबके पहले पहूँचता है तो उसे सबकी प्रतीक्षा करनी होती है। इस प्रकार जहाँ किसी काम के लिये सबका आसरा देखना होता है वहाँ उक्ति कही जाती है।
  • (१०३) सिंहवलोकन न्याय—सिंह शिकार मारकर जब आगे बढ़ता है तब पीछे फिर फिरकर देखता जाता है। इसी प्रकार जहाँ अगली और पिछली सब बातों की एक साथ आलोचना होती है वहाँ इस उक्ति का व्यवहार होता है।
  • (१०४) सूचीकटाह न्याय—सूई बनाकर कडा़ह बनाने के समान। किसी लोहार से एक आदमी ने आकर कडा़ह बनाने को कहा। थोडी़ देर में एक दूसरा आया, उसने सूई बनाने के लिये कहा। लोहार ने पहले सूई बनाई तब कडा़ह। सहज काम पहले करना तब कठिन काम में हाथ लगाना, इसी के दृष्टांत में यह कहा जाता है।
  • (१०५) सुंदोपसुंद न्याय—सुंद और उपसुंद दोनों भाई बडे़ बली दैत्य थे। एक स्त्री पर दोनों मोहित हुए। स्त्री ने कहा दोनों में जो अधिक बलवान होगा उसी के साथ मैं विवाह करूँगी। परिणाम यह हुआ कि दोनों लड़ मरे। परस्पर के फूट से बलवान् से बलवान् मनुष्य नष्ट हो जाता हैं यही सूचित करने के लिये यह कहावत हैं।
  • (१०६) सोपानारोहण न्याय—जिस प्रकार प्रासाद पर जाने के लिसे एक एक सीढी़ क्रम से चढ़ना होता है उसी प्रकार किसी बडे़ काम के करने में क्रम क्रम से चलना पड़ता हैं।
  • (१०७) सोपानावरोहण न्याय—सीढ़ियाँ जिस क्रम से चढ़ते हैं उसी के उलटे क्रम से उतरते हैं। इसी प्रकार जहाँ किसी क्रम से चलकर फिर उसी के उलटे क्रम से चलना होता है (जैसे, एक बार एक से सौ तक गिनती गिनकर फिर सौ से निन्नानवे, अट्ठानबे इस उलटे क्रम से गिनना) वहाँ यह न्याय कहा जाता है।
  • (१०८) स्थविरलगुड न्याय—बुड्ढे के हाथ फेंकी हुई लाठी जिस प्रकार ठीक निशाने पर नहीं पहुँचती उसी प्रकार किसी बात के लक्ष्य तक न पहुँचने पर यह उक्ति कही जाती है।
  • (१०९) स्थूणानिखनन न्याय—जिस प्रकार घर के छप्पर में चाँड़ देने के लिये खंभा गाड़ने में उसे मिट्टी आदि डालकर दृढ़ करना होता है उसी प्रकार युक्ति उदाहरण द्वारा अपना पक्ष दृढ़ करना पड़ता है।
  • (११०) स्थूलारुंधती न्याय—विवाह हो जाने पर वर और कन्या को अरुंधती तारा दिखाया जाता है जो दूर होने के कारण बहुत सूक्ष्म हैं और जल्दी दिखाई नहीं देता। अरुंधती दिखाने में जिस प्रकार पहले सप्तर्षि को दिखाते हैं जो बहुत जल्दी दिखाई पड़ता है और फिर उँगली से बताते हैं कि उसी के पास वह अरुंधती है देखो, इसी प्रकार किसी सूक्ष्म तत्त्व का परिज्ञान कराने के लिये पहले स्थूल दृष्टांत आदि देकर क्रमशः उस तत्त्व तक ले जाते हैं।
  • (१११) स्वामिभृत्य न्याय—जिस प्रकार मालिक का काम करके नौकर भी स्वामी की प्रसन्नता से अपने को कृतकार्य समझता है उसी प्रकार जहाँ दूसरे का काम हो जाने से अपना भी काम या प्रसन्नता हो जाय वहाँ के लिये यह उक्ति हैं।

Monday, May 31, 2021

💁‍♀️संस्कृत क्रिया पदानी ।


संस्कृत क्रिया पदानी ।

😀 - हसति 

😬 - निन्दति 

😇 - भ्रमति

🤔 - चिन्तयति 

😡 - कुप्यति

😴 - स्वपिति

😩 - क्षमां याचते 

😳 - विस्मयो भवति / निर्निमेषं पश्यति 

😌 - ध्यायति ,

👁 - पश्यति 

🗣 - वदति

✍ - लिखति 

🙏 - प्रणमति 

👉 - निर्दिशति 

🙌 - आशीषति

👃 - जिघ्रति 

🚶🏻- गच्छति

🏃🏻- धावति 

💃🏻 - नृत्यति

✈️ विमानम् 

🎁 उपायनम् ।

🚘 यानम् 

💺 आसन्दः / आसनम् 

⛵ नौका 

🗻 पर्वत: 

🚊 रेलयानम् 

🚌 लोकयानम् 

🚲,द्विचक्रिका 

🇮🇳 ध्वज:

🐰 शशक:

🐯 व्याघ्रः

🐵 वानर:

🐴 अश्व:

🐑 मेष:

🐘 गज:

🐢 कच्छप:

🐜 पिपीलिका 

🐠 मत्स्य:

🐄 धेनु: 

🐃 महिष:

🐐 अज: 

🐓 कुक्कुट:

🐕 श्व: / क्कुरः / सारमेयः।

🐁 मूषक:।

🐊 मकर:

🐪 उष्ट्रः।

🌸 पुष्पम् ।

🌳 वृक्ष:।

🌞 सूर्य:।

🌛 चन्द्र:।

⭐ तारक:।

☔ छत्रम् ।

👦 बालक:।

👧 बालिका ।

👂 कर्ण:।

👀 नेत्रे (द्वि.व)।

👃नासिका ।

👅 जिह्वा ।

👄 औष्ठौ (द्वि.व) ।

👋 चपेटिका ।

💪 बाहुः ।

🙏 नमस्कारः।

👟 पादत्राणम् ।

👔 युतकम् ।

💼 स्यूत:।

👖 ऊरुकम् ।

👓 उपनेत्रम् ।

💎 वज्रम् (रत्नम् ) ।

💿 सान्द्रमुद्रिका ।

🔔 घण्टा ।

🔓 ताल:।

🔑 कुञ्चिका ।

⌚ घटी।

💡 गोलदीप:।

🔦 करदीप:।

🔋 विद्युत्कोष:।

🔪 छूरिका ।

✏ अङ्कनी ।

📖 पुस्तकम् ।

🏀 कन्दुकम् ।

🍷 चषक:।🍴 

⬅ वामतः ।

➡ दक्षिणतः । 

⬆ उपरि । 

⬇ अधः । 

🎦 चलच्चित्र ग्राहकम् ।

🚰 नलिका ।

🛄 यानपेटिका ।

 📶 तरड़्ग सूचकम् ( तरड़्गाः) 

➕ सड़्कलनम् ।

➖ व्यवकलनम् । 

✖ गुणाकारः । 

➗ भागाकारः । 

% प्रतिशतम्  ।

@ अत्र (विलासम्) ।

⬜ श्वेतः ।

🔵 नीलः ।

🔴 रक्तः ।

⬛ कृष्णः ।













🌺 संस्कृत धातु का लट् रूप व धातु अर्थ 🌺


🌺 संस्कृत धातु का लट् रूप व धातु अर्थ 🌺

1. गच्छति - जाना

2. पठति - पढना

3. चलति - चलना  

4. नमति - नमन करना

5. प्रणमति - प्रणाम करना

6. हसति   -  हसना

7. लिखति  - लिखना

8. क्रीडति  - क्रीडा करना

9. नृत्यति   - नाचना

10. अवगच्छति - समझना

11. बोधयति - समझाना

12. धावति    - दौडना

13. पतति      - गिरना

14. भवति     -होना

15. पश्यति     - देखना

16. खादति     - खाना

17. पिबति      - पीना

18. पचति       - पकाना

19. रचयति     - रचना करना

20. सीव्यति     - सीलना

21. विस्मयति    - आश्चर्य होना

22. स्मयति      - मुस्कुराना

23. परिवेषयति  - परोसना

24. वर्षति        - बरसना

25. आगच्छति    - आना

26. आरोहति      - चढना

27. अवरोहति      - उतरना

28. आनयति      - लाना

29. लालयति       - लालन करना

30. पालयति      - पालन करना 

31. पोषयति        - पोषण करना

32. तोषयति       - संतुष्ट करना

33. कण्डूयति      - खुजलाना

34. क्षालयति        - धोना

35. प्रक्षालयति      - धोना

36. ज्वलति          - जलना

37. मार्जयति        - मिटाना

38. सम्मार्जयति    - सफाई करना

39. ताडयति         - पीटना /देखना

40. पूरयति         - पूर्ण करना

41. मिलति        - मिलना

42. वादयति        - बजाना

43. चालयति      - चलाना

44. तर्जयति        - डांटना

45. पृच्छति        - पूछना

46. कर्षति         - कृषि करना

47. दशति        - डसना

48. कर्तयति       - काटना

49. गायति        - गाना

50. अर्चति        - अर्चन करना

51. जपति       - जप करना 

52. ध्यायति     - ध्यान करना 

53. पूजयति     - पूजा करना 

54. त्रोटयति     - तोडना

55. निष्पीडयति - निचोडना

56. पाठयति     - पढाना

57. गणयति      - गिनना

58. बुक्कति     - भौंकना

59. गर्जति       - गर्जना करना 

60. कूजति   - पक्षी आवाज(कलरव)

61. सरति      - सरकना

62. भ्रमति      - घूमना 

63. अस्ति      - है

64. चोरयति     - चुराना

65. दर्शयति       - दिखाना

66. रटति        - रटना

67. हासयति    - हंसाना

68. नयति       -लाना

69. उपविशति - बैठना 

70. चरति       - चरना

71. खेलति       - खेलना

72. शुष्यति     - सूखना

73. नुदति      - दबाना

74. तुदति     - दु:ख देना

75. नदति      - बजना

76. नन्दति      - आनन्दित होना

77. निन्दति      - निन्दा करना 

78. जल्पति      - अनर्गल वार्ता करना 

79. प्रहरति       - प्रहार करना 

80. हरति        - हरण करना 

81. चिकित्सति -चिकित्सा करना 

82. अन्विष्यति  - खोजना

83. विकसति      - विकसित होना

84. ज्वालयति     - जलाना

85. चारयति       - चराना 

86. चर्वति       - चबाना

87. भर्जयति      - भूंजना

88. तर्जयति      - डांटना

89. कारयति       - करवाना

90. तरति        - तैरना

91. निमज्जति   - डूबना

92. स्नाति       - स्नान करना

93. स्वपिति    - सोना 

94. जृम्भति    - ऊबासी लेना

95. स्मरति    - स्मरण करना

96. विस्मरति  - भूलना

97. स्फुरति     - स्फुरण होना

98. स्पृशति      - स्पर्श करना

99. स्निह्यति     - स्नेह करना 

100. तिष्ठति       - रुकना

101. सूचयति     - सूचना देना

102. सरति       - सरकना 

103. सिञ्चति    - सींचना 

104. शुष्यति     - सूखना 

105. वहति      - बहना

106. प्रवहति      - बहना

107. वसति       - रहना 

108. निवसति    - रहना

109. वदति       - बोलना

110. रक्षति      - रक्षा करना 

111. मिलति     - मिलना

112. पृच्छति    - पूछना

113. पीडयति    - पीडा देना 

114. नश्यति     - नष्ट करना

115. धरति      - धारण करना/पहनना

116. धारयति-पहनाना/धारणकरवाना

117. त्यजति    - त्यागना

118. तोलयति   - तौलना

119. जीवति     - जीना

120. छादयति   - ढकना

121. श्वसिति  - श्वास लेना 

122. जिघ्रति     -सूंघना

123. अर्जति      - अर्जन करना

124. इच्छति      - इच्छा करना

125. ईर्ष्यति       - ईर्ष्या करना 

126. द्रुह्यति  - द्रोह करना/जलन होना

127. कथयति    - कहना

128. यजति   - यज्ञ करना

129. याचति    - मांगना

130. वपति    - बोना

131. जयति    - जीतना

132. क्रन्दति   - क्रन्दन करना

133. दहति     - दहन होना

134. फलति    - फलना

135. फुल्लति   -फूलना

136. पक्वति     - पकना

137. वाञ्छति   - इच्छा करना

138. काङ्क्षति   - कामना करना

139. शंसति      - प्रशंसा करना

140. प्रशंसति   - प्रशंसा करना ...... इत्यादय:


*(विशिष्टक्रियापदानि)*

141. पाठयति- पढाता है

142. करोति   - करना

143. ददाति     - देना

144. क्रीणाति   - खरीदना

145. बिभेति   - डरना

146. शक्नोति   - सकना

147. शृणोति     - सुनना 

148. जानाति -  जानना 

149.रोदिति  - रोना

150. जागर्ति - जागना ..इत्यादय:

Sunday, May 30, 2021

विलोम् शब्दाः

 

 विलोम् शब्दाः

1.अवनति  × उन्नति

2. अन्तरंग × बहिरंग

3. अल्पज्ञ × बहुज्ञ

4. अल्यायु× दीर्घायु

5. अन्तर्द्वन्द्व ×बहिर्द्वन्द्व

6. अन्तर्मुखी× बहिर्मुखी

7. अपेक्षा ×उपेक्षा

8. अग्रजः ×अनुजः

9. अज्ञः ×विज्ञः

10. अथ× इति

11. अनुग्रह ×विग्रह

12. अतिवृष्टिः× अनावृष्टिः

13. आविर्भावः×तिरोभावः

14. आचारः × अनाचारः

15. अधिकांशः×अल्पांशः

16. अपराण× पूर्वाह्न

17. अपररात्र ×पूर्वरांत्र

18. अधमर्णः ×उत्तमर्णः

19. आर्तिकर ×आर्तिहर

20. अवनि ×अम्बरः

21. आर्द्रः ×शुष्कः

22. अमावस्या× पूर्णिमा

23. अनुलोम ×प्रतिलोम

24. अंधकारः× प्रकाशः

25. अल्पसंख्यकः× बहुसंख्यकः

26. असभ्यः ×सभ्यः

27. अशिव× शिव

28. अनावरण ×आवरण

29. अभीष्टः×अनभीष्टः

30. अनुपस्थितः× उपस्थितः

31. अकर्मण्य× कर्मण्य

32. अपकीर्तिः ×कीर्तिः

33. आभ्यन्तर× बाह्य

34. अनिवार्य× वैकल्यिक

35. अग्र× पश्चात्

36. अपकर्ष ×उत्कर्ष

37. अवाङ्मुख ×उन्मुख/ऊर्ध्वमुख

38. आकीर्ण ×विकीर्ण

39. आकर्षण× विकर्षण

40. अत्यधिक× स्वल्प

41. अधित्यका ×उपत्यका

42. अधुनातन× पुरातन

43. अनुरक्ति× विरक्ति

44. अमिष ×निरामिष

45. आवाहन× विसर्जन

46. आवृत्त× अनावृत्त

47. आध्यात्मिक× आधिभौतिक

48. आकुंचन ×प्रसारण

49. अमृतेय× विषेय

50. अङ्गीकारः ×अस्वीकारः

51. अक्षम ×सक्षम

52. अनुर्वरा ×उर्वरा

53. आग्रह× दुराग्रह

54. अनृत× ऋत

55. अनुरक्त ×विरक्त

56. अपकारः× उपकारः

57. अधस्तन× उपरितन

58. अन्तर्गत ×बहिर्गत

59. ‘अन्तर्भूत ×बहिर्भूत

60. अत्र ×तत्र

61. अत्रत्य× तत्रत्य

62. अधः ×उपरि

63. अधिकतम× न्यूनतम

64. अध्यवसाय ×अनध्यवसाय

65. अर्पण ×ग्रहण

66. अर्पित× गृहीत

67. अश्रु ×हास

68. आदत्त× प्रदत्त

69. आदिष्ट ×निषिद्ध

70. आवर्तन ×अनावर्तत

71. आज्ञा× अवज्ञा

72. ईषत्× अलम्

73. ईश्वरः ×अनीश्वरः

74. उ्तम ×अधम

75. उच्च× निम्न

76. उत्तरायण ×दक्षिणायन

77. उत्कर्ष ×अपकर्ष

78. उत्तीर्ण ×अनुत्तीर्ण

79. उदयाचल ×अस्ताचल

80. उदात्त ×अनुदात्त

81. उद्यम ×निरुद्यम

82. उन्मीलन× निमीलन

83. उपसर्ग ×प्रत्यय

84. संधि ×विग्रह

85. उग्र ×सौम्य

86. उपार्जितः ×स्वयंप्राप्तः

87. उत्खनन× निखनन

88. ऐश्वर्यः ×अनैश्वर्यः

89. एकेश्वरवादः× बहुदेववादः

90. उदीची ×अवाची

91. करुणः× निष्करुणः

92. उत्पतन ×निपतन

93. ऐक्य ×अनैक्य

94. ऋजु ×वक्र

95. कृतज्ञ× कृतघ्न

96. कृतिम ×प्राकृत

97. कनिष्ठः ×ज्येष्ठः

98. कुत्सा× स्तुति

99. कलुष ×निष्कलुष

100. कृशः ×स्थूलः

101. कंटकः× निष्कण्टकः

102. गुरू ×लघु

103. गौरव× लाघव

104. गुणवान्× गुणातीत

105. शोषण ×पोषण

106. ग्रहण× त्याग

107. ग्रास ×मोक्ष

108. चिन्मय ×स्थावरः

109. ज्योति ×तम

110. जंगमः ×जड

111. क्षुद्र ×महान्

112. क्षणिक× शाश्वत

113. ज्योत्स्ना× तमिना

114. जागृति ×सुषुप्ति

115. तामसिक ×सात्विक

116. तीव्र ×मन्द

117. तिक्त ×मधुर

118. तीक्ष्ण ×कुंठित

119. तृषा× तृप्ति

120. देवः ×दानवः

121. दीर्घकाय ×कृशकाय

122. दिवा ×रात्रि

123. दण्डः ×पुरस्कारः

124. तरुणः× वृद्धः

125. दुर्गति× सद्गति

126. दृश्य ×अदृश्य

127. दुःशील ×सुशील

128. निंद्य ×वंदय

129. धृष्टः ×विनीतः

130. नराधमः×नरोत्तमः

131. निशीथ ×मध्याह्न

132. निर्लज्ज ×सलज्ज

133. निरक्षरः ×साक्षरः

134. प्रवृत्ति ×निवृत्ति

135. प्रत्यक्षतः ×परोक्षतः

136. पृथु× तनु

137. पण्डितः ×मूर्खः

138. प्रलयः ×सृष्टि

139. प्रज्ञः× मूढ़:

140. प्रातः सायम्

141. प्रदोषः× प्रत्यूषः

142. प्रफुल्ल× म्लान

143. प्रभु× भृत्यः

144. प्राची ×प्रतीची

145. ब्रह्म× जीवः

146. प्रकट ×प्रच्छन्न

147. बद्घः ×मुक्तः

148. भर्ता× भार्या

149. मसृण ×रूक्ष

150. भूत ×भविष्य

151. भ्रान्त ×निभ्रान्त

152. मुखर× तूष्णीक

153. मितव्यय× अपव्यय

154. मिथ्या ×सत्य

155. यथार्थः ×कल्पितः

156. मुख ×पृष्ठः

157. रिक्त× पूर्ण

158. यौवन× वार्धक्य

159. व्यष्टि× समष्टि

160. विजय ×पराजय

161. विश्लेषण× संश्लेषण

162. वैमनस्य× सौमनस्य

163. वाग्मी× मितभाषी

164. विपद्× सम्पद्

165. विपुल× न्यून

166. श्वासः× प्रश्वासः

167. शत्रु ×मित्र

168. शुक्लः× कृष्णः

169. स्वकीया ×परकीया






Wednesday, May 26, 2021

Sanskrit sahithyakar / भवभूति/ महाकवि माघ

 

   

            भवभूति

 * समय - 680 - 750 ई के मध्य

* पितामह - भट्ट गोपाल.     

 पिता - नीलकण्ठ

* माता - जतुकर्णी.    

भवभूति का मूल नाम - श्री कण्ठ

* गोत्र - काश्यप.      

 भवभूति के गुरु - ज्ञाननिधि 

* भवभूति उपासक थे - शिव के   

* निवासी - पद्मपुर 

* भवभूति का दार्शनिक नाम - उदुम्बर 

* रचनाएँ —3

1.उत्तररामचरित - 7अंक नाटक (करुणरस) 

2. महावीरचरित - 7अंक नाटक (वीररस) 

3. मालतीमाधव - 10 अंक प्रकरण (श्रृंगार रस) 

* भवभूति का प्रिय छन्द - अनुष्टुप और शिखरिणी 


*उपाधि-शिखरिणी कवि, पदवाक्यप्रमाणज्ञ, परिणतज्ञ

* भवभूति कन्नौज राजा यशोवर्मा के राजाश्रय में थे। 

* "कारूण्यं भवभूतिरेवतनुते "



महाकवि माघ 


★स्थितिकाल:- ६७५ ई. (लगभग) या भारवि के बाद का समय।


★जन्म स्थान:- भीनमाल, जिला:-जालौर,राजस्थान।


★महाकवि माघ के पिता:- श्री सुप्रभवदेव


★महाकवि माघ का जाति:- श्रीमाली ब्राह्मण


★महाकवि माघ की उपाधि:- घण्टामाघ 


★महाकवि माघ  का प्रिय छन्द:- मालिनी।


★माघ के मृत्यु का कारण:- पादशोथ रोग।

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

 

     अभिज्ञानशाकुन्तलम्



रचनाकार थे कालिदास।


उपमा सम्राट किसे कहा जाता है?


-कालिदास जी को


कितने अंक है?


-सात


नायक कौन है?


दुष्यन्त


नायिका कौन है?


शकुन्तला


"अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नाटक की उपजीव्य का आधार क्या है?


-महाभारत का आदिपर्व।


"अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नाटक का प्रारम्भ कैदी से होता है?


-नान्दी स्तुति से।


"रस -श्रृंगार रस


"अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नाटक में कौन सा गुण है?


।-प्रसाद गुण।



शकुन्तला के पिता कौन थे?


-विश्वामित्र


शकुन्तला के धर्मपिता कौन थे?


उत्तर-कण्व


शकुन्तला की माता कौन थी?


मेनका


"अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नाटक के विदूषक का नाम क्या था?


-माढव्य


शकुन्तला - दुष्यन्त का कैसा विवाह था?


-गन्धर्व विवाह


शकुन्तला को शाप कौन दिए?


-दुर्वासा


वसुमती कौन थी?


दुष्यन्त की द्वितीय पटरानी।


महर्षि कण्व का आश्रम कंहाँ था?


मालिनी नदी के तट पर।


राजा दुष्यन्त के आश्रम में आगमन पर कण्व ऋषि कंहाँ गए हुए थे?


सोमतीर्थ


शकुन्तला की प्रिय सखी कौन थी?


प्रियम्बदा।


शकुन्तला के पुत्र का नाम क्या था?


सर्वदमन (भरत)


अभिज्ञान क्या है?


अंगूठी का नाम।


शकुन्तला की अंगूठी कंहाँ गिर जाता है?


शचीतीर्थ में।




1-अभिज्ञानशाकुतलम का सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद "विलियमजोन्स" ने किया।

2-अभिज्ञानशाकुतलम का दुष्यंत नायक है-धीरोदात्त प्रकृति का।

3-अभिज्ञानशाकुतलम में रीति है -वेदर्भी ।

4-"अभिज्ञान" शब्द का अर्थ है-पहचान ।

5-शर्मिष्ठा के पिता थे-वृषपर्वा

6-शाप से मुक्ति के लिए दुर्वासा से "प्रियम्बदा" ने निवेदन किया।

7-गौतमी वृद्धा तापसी थी।

8-शकुन्तला को विदाई का संदेश दिया- कण्व ने।

9-परिजन का अर्थ है- सेवकजन।

10-निक्षेप का अर्थ है - धरोहर।


11-अभिज्ञानशाकुंतलं में समास है -मध्यम्पदलोपी

12-अभिज्ञानशाकुंतलं में कुल श्लोक 196

13-अभिज्ञानशाकुन्तलम में अंक है - 7

14-अभिज्ञानशाकुंतलं में नायक की प्रकृति है धीरोदात्त।

15-अभिज्ञानशाकुन्तल में नायिका की प्रकृति है मुग्धा

16- अभिज्ञानशाकुन्तलम के रचयिता - उपमा सम्राट महाकवि कालिदास हैं l

17- शकुंतला के जनक - विश्वामित्र व मेनका l

18- अवसितमंडना कौन है -शकुंतला

19- शर्मिष्ठा व ययाति के पुत्र का नाम -पुरु

20- कन्या कीदृशः अर्थः अस्ति ?- परकीयः


21- अद्य का यास्यति ? - शकुंतला

22- मुनीनां धनं किम अस्ति ?- संयम

23- प्रकृतिपेलवा का ? - शकुन्तला

24- वैतानास्त्वां वह्नयः पावयन्तु का वक्ता कौन है - काश्यप

25- कस्मिन समये शकुंतलाया: उत्स्व: भवति ?- कुसुम प्रसूति समये

26- सूर्योदये एव का शिखामज्जिता ? - शकुन्तला

27- वामहस्तोपहित वदना का अस्ति ?- शकुन्तला

बुद्धचरितं - महाकाव्य

 

  बुद्धचरितं - महाकाव्य




कथा वस्तु:- 


बुद्धचरितं महाकाव्य जो संस्कृत में उपलब्ध प्रथम ग्रन्थ है जिसमे भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र एवं सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। इसे बौद्धों का रामायण भी माना जाता है।


लेखक:- अश्वघोष


काल:- प्रथम शताब्दी (लगभग ७८ई.)


सर्ग:- २८ सर्ग परन्तु संस्कृत में १४।


कथावस्तु- ललित विस्तार नामक बौद्ध ग्रन्थ।


नायक:- बुद्ध (धीरोदात्त और धीरप्रशांत नायक)


रस:- शान्त रस।


छंद - उपजाति और अनुष्टुप् ।


मुख्य अलंकार:- अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, उपमा, रूपक यमक,और अर्थान्तरन्यास।


मुख्य रीति:- शुद्ध वैदर्भी।


मुख्य गुण:- प्रसाद व माधुर्य।


मुख्य पात्र:- शुद्धोदन ,महामाया, गौतम बुद्ध, यशोधरा, छन्दक, बिम्बिसार, कामदेव और श्रवण।


कपिलवस्तु जनपद के राजा शुद्धोदन, रानी महामाया



बुद्धचरित के सर्ग:-


बुद्धचरितम् मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के दूसरे सर्ग से लेकर तेरहवें सर्ग तक पूर्ण रूप से तथा पहला एवं चौदहवाँ सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं। इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। प्रथम चौदह सर्गों के नाम इस प्रकार हैं-


१.भगवत्प्रसूति,


२.अन्तःपुरविहार


३.संवेगोत्पत्तिः


४.स्त्रीविघातन


५.अभिनिष्क्रमण


६.छन्दकनिवर्तनम्


७.तपोवनप्रवेशम्


८.अंत:पुरविलाप


९.कुमारान्वेषणम्


१०.श्रेणभिगमनम्


११कामविगर्हणम्


१२आराडदर्शन


१३मारविजय


१४.बुद्धत्वप्राप्ति।

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