Tuesday, May 25, 2021

शब्द



शब्द



 संस्कृत-भाषा में मुख्यतः तीन प्रकार के शब्द होते हैं


१) शब्दरुप वाले शब्द 

२) क्रियारुप वाले शब्द 

३) अव्यय शब्द


१)शब्दरुप वाले शब्द- इस वर्गीकरण के अन्तर्गत वे शब्द आते हैं जिनके सात विभक्तियों व तीन वचनों में रुप चलते हैं। ये संज्ञा,सर्वनाम या विशेषणवाची शब्द होते हैं। इनकी विशेषता यह है कि जिन शब्दों का अन्तिम वर्ण व लिङ्ग मिलता हो उनके रुप एक समान चलते हैं। जैसे राम

अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द है अतः सभी अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों के रुप एक समान चलेगें। इसी प्रकार अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द-राम,बालक,छात्र,श्याम आदि

आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द- लता,रमा,अजा,बालिका आदि

इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द- हरि,रवि,गिरि,कपि आदि

इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द- मति,गति,बुद्धि,शक्ति आदि


२) क्रियारुप वाले शब्द- इस वर्गीकरण के अन्तर्गत वे शब्द आते हैं जिनके तीन पुरुषों(प्रथम पुरुष,मध्यम पुरुष,उत्तम पुरुष) व तीन वचनों में रुप चलते हैं। ये क्रियावाची शब्द होते हैं। इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है

१)परस्मैपदी

२) आत्मनेपदी।

परस्मैपदी क्रियाओं के रुप लगभग एक समान चलते हैं व आत्मनेपदी क्रियाओं के रुप एक समान चलते हैं।


३) अव्यय शब्द- इस वर्गीकरण के अन्तर्गत वे शब्द आते हैं जिनके रुप

सभी विभक्तियों,लिङ्गों व वचनों में एक समान रहते हैं अर्थात् उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। उदाहरण- यत्रतत्र,सर्वदा,यतः,ततः आदि ।


२. सन्धि विचार

 


       २. सन्धि विचार 


सन्धि का साधारण अर्थ है " मेल "  दो वर्णों के निकट आने से मेल उत्पन्न होता है , उसे इसीलिए सन्धि कहते हैं । सन्धि के लिए दोनो वर्ण एक दूसरे के पास - पास सटे हुए होने चाहिए , दूरवर्ती शब्दो मे सन्धि नही हो सकती । वर्णों की इस समीप स्थिति को सहिंता कहते है इसलिए संस्कृत भाषा मे सन्धि का नियम यह है कि जिन शब्दो में निकटता की घनिष्टता हो उनमे सन्धि अवश्य हो , जहाँ निकटता घनिष्ठ न हो वहाँ सन्धि करना न करना बोलने वाले की इच्छा पर निर्भर है।


मुख्य नियम यह है:- 

"एकपद ' के भिन्न - भिन्न अवयवो में धातु और उपसर्ग के बीच और समास मे सन्धि अवश्य होनी चाहिए ( क्योकि वहाँ सहिता ऐच्छिक नही हो सकती), वाक्य के अलग - अलग शब्दो के बीच मे सन्धि करना , न करना ( सहिता ) बोलने वाले की इच्छा पर है। जैसे:- 

>एकपद - पौ + अक = पावक। 

>उपसर्ग और धातु - नि + अवसत् = न्यवसत् , उत् + अलोकयत् = उदलोकयत् 

>समास - कृष्ण + अस्त्रम् = कृष्णास्त्रम् ,श्री ईश = श्रीश । 

>वाक्य - राम गच्छति वनम् , अथवा रामो गच्छति वनम् । 

 

 सन्धि के कारण नीचे लिखे परिवर्तन उपस्थित हो सकते हैं:-

(१) लोप - प्रथम शब्द के अन्तिम अक्षर का ( यथा - राम प्रआयाति राम आयाति ) , अथवा द्वितीय शब्द के प्रथम अक्षर का ( यथा - दोष + अस्ति = दोषोऽस्ति ) ।

(२) दोनो के स्थान मे कोई नया वर्ण ( यथा - रमा + ईश = रमेश अथवा दो मे से किसी एक के स्थान मे नया वर्ण ( यथा - नि + अवसत् = त्यवसत् कस्मिन् + चित् कस्मिंश्चित् ) ।

(३) दो मे से एक का द्वित्व ( यथा - एकस्मिन् + अवसरे एकस्मिन्न वसरे ) । 


शब्दो की निकटता इसलिए नीचे लिखे प्रकारो की होगी।


१. जहाँ प्रथम शब्द का अन्तिम वर्ण तथा द्वितीय का प्रथम वर्ग दोनों स्वर हो ।

२. जहाँ दो मे से बाद में स्वर हो , पूर्व व्यजन

३. जहाँ दोनो व्यजन हो।

४. जहाँ प्रथम का अन्तिम विसर्ग हो और द्वितीय का प्रथम स्वर अथवा व्यजन । द्वितीय के प्रारम्भ मे विसर्ग नही पा सकता , क्योंकि विसर्ग से किसी शब्द का प्रारम्भ नही होता। 

इनमें से 

( १ ) को स्वर - सन्धि , 

( २ ) और 

( ३ ) को व्यजन - सन्धि और 

( ४ ) को विसर्ग - सन्धि कहते है ।



           १. स्वर - सन्धि

 नियम (१) यदि ' साधारण ह्रस्व अथवा दीर्घ अ , इ , उ , ऋ स्वर के अनन्तर सवर्ण ह्रस्व अथवा दीर्घ स्वर आये , तो दोनो के स्थान मे ' सवर्ण - दीर्घ स्वर होता है, यथा:- 

(क) दैत्य + अरि = दैत्यारि। (ख) तव + आकार - तवाकार ।


नियम (२) यदि ऋ या लृ के बाद ह्रस्व ऋ या ल आवे तो दोनो के स्थान मे ह्रस्व ऋ या ल भी स्वेच्छा से करते है , जैसे - 

होतृ - + ऋकार = होतृकार या होतकार । इस प्रकार सब मिलाकर तीन रूप हुए ( १ ) होतृकार ( २ ) होतकार ( ३ ) होऋकार ' ।

 होत + लृकार = होतलकार अथवा होतृ लुकार ।


नियम (३) - यदि ' अ या आ के बाद:-


 ( १ ) ह्रस्व इ या दीर्घ ई आवे तो दोनो के स्थान मे " ए " हो जाता है ,

 ( २ ) यदि ह्रस्व उ या दीघ ऊ आवे तो दोनो के स्थान मे " ओ " हो जाता है , ( ३ ) यदि ह्रस्व ऋ या दीर्घ ऋ आवे तो दोनो के स्थान मे " अर् " हो जाता है , ( ४ ) यदि लृ आवे तो दोनो के स्थान मे " अल् " हो जाता है । इस सन्धि का नाम गुण है । जैसे:-

 उप + इन्द्र = उपेन्द्र । गण + ईश = गणेश । रमा + ईश = रमेश । गङ्गा + ईश्वर = गङ्गेश्वर । 


कुछ स्थल ऐसे है जहाँ पर यह नियम नही लगता वे नीचे दिखाये जाते है:- 

( क ) अक्ष + ऊहिनी - अक्षौहिणी । ( यहाँ पर " न " के स्थान मे " ण " कैसे हो गया , यह आगे बताया जायगा । ) यहाँ गुण स्वर ओ न होकर वृद्धि स्वर औ हुआ है । 

( ख ) ' जब " स्व " शब्द के बाद " ईर " और ईरिन आते है तो " स्व " के प्रकार और ईर् व ईरिन् के ईकार के स्थान मे " ऐ " हो जाता है , जैसे - स्व ईर = स्वैर ( स्वेच्छाचारी ) 

( ग ) जब प्र के बाद ऊह , ऊढि , एष , एष्य आते है तो दोनो के स्थान पर सन्ध्यक्षर गुण स्वर न होकर वृद्धि स्वर होता है । जैसे :- प्र+ऊह = प्रोह

(घ) यदि अकारान्त उपसर्ग के बाद ऐसी धातु आवे जिसके आदि मे ह्रस्व " ऋ " हो तो " अ " और " ऋ " के स्थान मे “ आर् " ( वृद्धि ) नित्य हो जाता है , जैसे उप + ऋच्छति उपार्छति । प्र + ऋच्छति प्रार्छति । किन्तु यदि नामधातु हो तो “ आर " विकल्प से होगा , जैसे प्र + ऋषभीयति प्रार्षमीयति , प्रर्षभीयति ( बैल की तरह आचरण करता है ) ।

 ( ड ) ' जब ऋत शब्द के साथ किसी पूर्वगामी शब्द का तृतीयासमास हो , तब भी पूर्वगामी अ और ऋत के ऋ से मिलाकर आर बनेगा , अर नही । जैसे सुखेन ऋत = सुख - ऋत = सुखार्त । 

( च ) अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ऋ , ऋ तथा लृ जब किसी पद के अन्त मे रहे और इनके बाद ह्रस्व " ऋ " आवे तो वे विकल्प से ह्रस्व हो जाते है । यदि पहले से ह्रस्व है , तो वह भी फिर से हुआ ह्रस्व माना जाएगा और इस प्रकार हुई ह्रस्व विधि में फिर दूसरी सन्धि नही होती । इसे ' प्रकृतिभाव ' कहते हैं । यह नियम गुणसन्धि का विकल्प प्रस्तुत करता है , जैसे ब्रह्मा + ऋषि ब्रह्म ऋषि , ब्रह्मर्षि । सप्त + ऋषीणाम् = सप्त ऋषीणाम् , सप्तर्षीणाम् ।




          १. स्वर - सन्धि


 नियम (१) यदि ' साधारण ह्रस्व अथवा दीर्घ अ , इ , उ , ऋ स्वर के अनन्तर सवर्ण ह्रस्व अथवा दीर्घ स्वर आये , तो दोनो के स्थान मे ' सवर्ण - दीर्घ स्वर होता है, यथा:- 

(क) दैत्य + अरि = दैत्यारि। (ख) तव + आकार - तवाकार ।


नियम (२) यदि ऋ या लृ के बाद ह्रस्व ऋ या ल आवे तो दोनो के स्थान मे ह्रस्व ऋ या ल भी स्वेच्छा से करते है , जैसे - 

होतृ - + ऋकार = होतृकार या होतकार । इस प्रकार सब मिलाकर तीन रूप हुए ( १ ) होतृकार ( २ ) होतकार ( ३ ) होऋकार ' ।

 होत + लृकार = होतलकार अथवा होतृ लुकार ।


नियम (३) - यदि ' अ या आ के बाद:-


 ( १ ) ह्रस्व इ या दीर्घ ई आवे तो दोनो के स्थान मे " ए " हो जाता है ,

 ( २ ) यदि ह्रस्व उ या दीघ ऊ आवे तो दोनो के स्थान मे " ओ " हो जाता है , ( ३ ) यदि ह्रस्व ऋ या दीर्घ ऋ आवे तो दोनो के स्थान मे " अर् " हो जाता है , ( ४ ) यदि लृ आवे तो दोनो के स्थान मे " अल् " हो जाता है । इस सन्धि का नाम गुण है । जैसे:-

 उप + इन्द्र = उपेन्द्र । गण + ईश = गणेश । रमा + ईश = रमेश । गङ्गा + ईश्वर = गङ्गेश्वर । 


कुछ स्थल ऐसे है जहाँ पर यह नियम नही लगता वे नीचे दिखाये जाते है:- 

( क ) अक्ष + ऊहिनी - अक्षौहिणी । ( यहाँ पर " न " के स्थान मे " ण " कैसे हो गया , यह आगे बताया जायगा । ) यहाँ गुण स्वर ओ न होकर वृद्धि स्वर औ हुआ है । 

( ख ) ' जब " स्व " शब्द के बाद " ईर " और ईरिन आते है तो " स्व " के प्रकार और ईर् व ईरिन् के ईकार के स्थान मे " ऐ " हो जाता है , जैसे - स्व ईर = स्वैर ( स्वेच्छाचारी ) 

( ग ) जब प्र के बाद ऊह , ऊढि , एष , एष्य आते है तो दोनो के स्थान पर सन्ध्यक्षर गुण स्वर न होकर वृद्धि स्वर होता है । जैसे :- प्र+ऊह = प्रोह

(घ) यदि अकारान्त उपसर्ग के बाद ऐसी धातु आवे जिसके आदि मे ह्रस्व " ऋ " हो तो " अ " और " ऋ " के स्थान मे “ आर् " ( वृद्धि ) नित्य हो जाता है , जैसे उप + ऋच्छति उपार्छति । प्र + ऋच्छति प्रार्छति । किन्तु यदि नामधातु हो तो “ आर " विकल्प से होगा , जैसे प्र + ऋषभीयति प्रार्षमीयति , प्रर्षभीयति ( बैल की तरह आचरण करता है ) ।

 ( ड ) ' जब ऋत शब्द के साथ किसी पूर्वगामी शब्द का तृतीयासमास हो , तब भी पूर्वगामी अ और ऋत के ऋ से मिलाकर आर बनेगा , अर नही । जैसे सुखेन ऋत = सुख - ऋत = सुखार्त । 

( च ) अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ऋ , ऋ तथा लृ जब किसी पद के अन्त मे रहे और इनके बाद ह्रस्व " ऋ " आवे तो वे विकल्प से ह्रस्व हो जाते है । यदि पहले से ह्रस्व है , तो वह भी फिर से हुआ ह्रस्व माना जाएगा और इस प्रकार हुई ह्रस्व विधि में फिर दूसरी सन्धि नही होती । इसे ' प्रकृतिभाव ' कहते हैं । यह नियम गुणसन्धि का विकल्प प्रस्तुत करता है , जैसे ब्रह्मा + ऋषि ब्रह्म ऋषि , ब्रह्मर्षि । सप्त + ऋषीणाम् = सप्त ऋषीणाम् , सप्तर्षीणाम् ।



नियम (४) - जब " अ " अथवा " आ " के बाद:-


 ( १ ) " ए " या " ऐ " आवे , तो दोनो के स्थान में “ ऐ " हो जाता है और जब " ओ " या " औं " आवे , तो दोनो के स्थान में " औ " हो जाता है । इस सन्धि का नाम “ वृद्धि " है , यथा-


१. कृष्ण + एकत्वम - कृष्णैकत्वम् । गंगा + एषा = गङ्गैषा ।

 २. जल +ओघ = जलौघ ।


नियमातिरेक


 ( क ) यदि अकारान्त उपसर्ग के बाद एकारादि या ओकारादि धातु आवे तो दोनो के स्थान मे " ए " या " ओ " हो जाता है , यथा

 प्र + एजते-  प्रेजते । उप +ओषति = उपोषति । 

किन्तु यदि वह धातु नामधातु हो तो विकल्प से वृद्धि होती है जैसे-

 उप + एडकीयति उपेडकीयति या उपैडकीयति । प्र + ओधीयति -प्रोधीयति या प्रौधीयति ।


( ख ) एव के साथ भी जब अनिश्चय का बोध हो , तब पूवगामी अकारान्त शब्द का अ और एव का ए मिल कर ए ही रह जायेंगे , जैसे-

 क्व एव भोक्ष्यसे - क्वेव भोक्ष्यसे ( कही भी खा लोगे ) । 

जब अनिश्चय नही रहेगा तब ऐ ही होगा , यथा ' तवैव ' ।


( ग ) शक + अन्धु , कुल + अटा , मनस् + ईषा इत्यादि उदाहरणो मे भी परवर्ती शब्द के आदि स्वर का ही अस्तित्व रहता है । पूर्ववर्ती शब्द की टि ' परवर्ती के आदि स्वर के रूप मे मिल जाती है । इनमे प्रथम दो उदाहरण अक सवर्णे दीर्घ ' सूत्र से होने वाली दीघ सन्धि के अपवाद है । शक + अन्धु = शक्न्धु , कुल + अटा = कुलटा। यदि ह्रस्व या दीघ इ , उ , ऋ तथा लृ के बाद असवण स्वर आवे तो इ , उ , ऋ , लृ के स्थान में क्रमश य् , व् , र् और ल् हो जाते है , जैसे-


दधि - पत्र = दध्यत्र । मधु + अरि = मध्वरि ।




वर्ण विचार

 

वर्ण विचार 












यद्यपि आप सब संस्कृत वर्णो से अवगत है किंतु फिर भी एक बार परिचय के लिए आप उन्हें ऊपर दी गई फ़ोटो में अवश्य देखें। 


१ पाणिनि ने इन्ही अक्षरो को इस क्रम मे 

बाँधा है। अइउण, ऋलुक्, एओङ , ऐऔच् , हयवरट् , लण् , अमङणनम् , झमञ् , पढयष् , जबगडदश् , खफछठथचटतव् , कपय्, शषसर् , हल् ।


ये चौदह सूत्र माहेश्वर कहलाते हैं , क्योकि पाणिनि को महेश्वर की कृपा से प्राप्त हुए थे, ऐसा सम्प्रदाय है । इनको प्रत्याहार सूत्र भी कहते हैं , क्योकि इनके द्वारा सरलता से और सूक्ष्म रीति से अक्षरो का बोध हो जाता है । ऊपर के जो अक्षर हल् हैं इत् कहलाते हैं , जैसे ण, क् आदि । इनके द्वारा प्रत्याहार बनते हैं । पूर्व के किसी सूत्र का कोई वर्ण लेकर उसको यदि आगे की किसी इत् के पूर्व जोड दें तो प्रत्याहार बनेगा वह उस पूर्व वर्ण का तथा उसके और इत् के बीच के सभी वर्गों का ( बीच मे पडने वाले इतो को छाडकर ) बोषक होगा, ( आदिरन्त्येन सहेता १ । १। ७१ ) यथा  - अक् अ इ उ ऋ लृ का 

शल् श ष स ह।


 यद्यपि प्रत्याहार की इस विधि द्वारा इनकी संख्या सहस्त्रों हो सकती है किंतु प्रत्याहार ४३ ही है।



स्वर का अर्थ है , ऐसा वर्ण जिसका उच्चारण अपने आप हो सके , जिसको दूसरे वर्ण से मिलने की अपेक्षा न हो । ऐसे वर्ण जिनका बिना किसी दूसरे वर्ण ( अर्थात् स्वर ) से मिले हुए उच्चारण नही हो सकता , व्यजन कहलाते हैं ।


 हमारे वर्गों के स्थान इस प्रकार है -


१. अ , आ , विसर्ग , क , ख , ग , घ , ड,- कण्ठ

२.  इ , ई , य , च , छ , ज , झ , ञ , श - तालु 

३. ऋ , ऋ , र , ट , ठ , ड , ढ , ण , ष- मूर्धा

४. लु , ल ल , त , थ , द , ध , न , स - दन्त

५. उ , ऊ , उपध्मानीय , प , फ , ब , भ , म - ओष्ठ


स्वरो का दूसरा नाम अच् भी है, क्योकि पाणिनि के क्रमानुसार स्वरवाची प्रत्याहार सूत्र सब इसके अन्तर्गत आ जाते है । ( प्रथम सूत्र का प्रथम अक्षर अ और चतुर्थ सूत्र का अन्तिम अक्षर च् ) । इसी प्रकार व्यजन का दूसरा नाम हल भी है , क्योकि व्यजनवाची प्रत्याहार सूत्र सब ( ५ से १४ तक ) इसके अन्तर्गत आ जाते है ।

स्वर तीन प्रकार के होते हैं - ह्रस्व, दीर्घ ( सादे और मिश्रविकृत ) और प्लुप्त।


विसर्ग को वस्तुत एक छोटा ह समझना चाहिए । यह सदा किसी स्वर के अन्त में आता है । यह स् अथवा र का एक रूपान्तर मात्र है , किन्तु उच्चारण की विशेषता के कारण इसका व्यक्तित्व अलग है । यह जिस स्वर के पश्चात् जुटा होगा उसी के उच्चारण - स्थान से उच्चरित होगा ।




१. वर्ण विचार

 



            १. वर्ण विचार 


'व्याकरण' का अर्थ है ' किसी वस्तु के टुकडे - टुकडे करके उसका ठीक स्वरूप दिखाना। ' यह शब्द भाषा के सम्बन्ध मे ही अधिक प्रयोग में आता है । यदि देखा जाय तो प्रत्येक भाषा वाक्यो का समूह है । वाक्य कोई बडे होते हैं, कोई छोटे। बडे वाक्य बहुधा छोटे वाक्यो के सुसम्बद्ध समूह होते हैं। वस्तुत वाक्य भाषा का आधार है । वाक्य शब्दो का समूह होता है । प्रत्येक शब्द में कई वर्ण होते हैं , जिनको अक्षर भी कहते हैं। अक्षर शब्द का अर्थ है ' अविनाशी ' - जिसका कभी नाश न हो। वर्ण को यह नाम इसलिए दिया जाता है, क्योकि प्रत्येक ( वर्ण का ) नाद अविनश्वर है। यदि किसी शब्द का उच्चारण करें तो उसके अक्षर उच्चारण - काल मे नाद कहलाएंगे और उस दशा में शब्द नादो का समूह होगा और इस नाद - समूह को शब्द इसीलिए भी कहते हैं क्योकि नाद, शब्द और ध्वनि का प्राय एक ही अर्थ है। अतएव महाभाष्यकार ने कहा है ' तस्माद् ध्वनि शब्द '। सुष्टि मे इन नादो का भण्डार अनन्त है। प्रत्येक भाषा एक परिमित सख्या मे ही नादो का प्रयोग करती है।


पाणिनि - व्याकरण के अध्ययन की विधि

 

पाणिनि - व्याकरण के अध्ययन की विधि


व्याकरण - शास्त्र को अच्छी तरह अल्पकाल मे समझने के लिए वैज्ञानिक विधि यह है कि सज्ञाओं, प्रत्याहारो तथा अन्य पूर्वोलिखित साधनो का सम्यक् ज्ञान कर ले । प्रथमतः सज्ञां प्रभृति का साधारण ज्ञान और इसके इसके पश्चात् किस तरह प्रत्यय जुडते हैं और किस प्रकार एक सूत्र से दूसरे सूत्र मे अनुवृत्ति की जाती है, इसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रत्यय लगने की विधि नीचे दी जाती है । 

( १ ) प्रत्यय मे पहले यह देखना चाहिए कि कितना प्रश जुडने के उपयोग में आने वाला है , जैसे ण्यत् प्रत्यय में चुटू सूत्र से आदि में आने वाला ण् तथा हलन्त्यम् सूत्र से त् लुप्त हो जाते हैं । केवल य भर बच रहता है । 

( २ ) पुन: यह देखना चाहिए कि इस प्रत्यय को पहले जुडना है या पीछे या बीच मे । इस सम्बन्ध में एक ही नियम है प्रत्यय ( ३ । १ । १ ) परश्च ( ३ । १ । २ ) अर्थात् प्रत्यय सदा बाद में ही जुडते है ( केवल तद्धित का एक प्रत्यय बहुच ऐसा है जो ईषदसमाप्ति अर्थ मे शब्द के पहले जुडता है , जैसे बहुतृण आदि ) ।

( ३ ) फिर यह देखना चाहिए कि जिसमे प्रत्यय को जुडना है , उसमे अनुबन्धो के कारण किस विकार का होना आवश्यक है , जैसे अचो ण्णिति ( ७ । २ । ११५ ) अर्थात् जित् , तथा णित् प्रत्यय बाद में रहने पर पूर्व मे आने वाले अजन्त अङ्ग के स्वर की वृद्धि हो जाती है । इस सूत्र के अनुसार ' हृ ' के आगे ‘ ण्यत् ' आने पर ' हृ ' के ऋ में वृद्धि होकर ' पार् ' हो जाता है । 

( ४ ) और अन्त मे, अर्थ समझने के लिए किस हेतु से प्रत्यय लगा है इसे समझना चाहिए । कृदन्त तथा तद्धित प्रकरणो मे इसका विशेष विवेचन किया जायगा। इन सब बातो को ध्यान में रखते हुए यदि कोई अध्ययन करे तो अल्पकाल में ही साधारण कोटि का व्युत्पन्न हो सकता है।



 

शरीरस्य अङ्गानि




शरीरस्य अङ्गानि


मुण्डम् - सिर

केशः - बाल

जटा - जटा

शिखा - चोटी

वेणी - स्त्री की चोटी

पलितम् - सफेद बाल

लालाटः - माथा

मस्तिषकम् - दिमाग

नेत्रम् , चक्षुः , लोचनम् - आँख

घ्राणम् , नासिका - नाक

आस्यम् , मुखम् - मुँह

रसना , जिह्वा - जीभ

रदनः , दन्तः , दशनम् - दाँत

कर्णः , श्रोत्रम् - कान

ओष्ठः - होँठ

अधरोष्ठः - नीचे का होँठ 

उत्तरोष्ठः - ऊपर का होँठ

भ्रूः - भौँह

पक्ष्मः - पलक

कपोलः - गाल

श्मश्रु - मूँछ

कूर्चम् - दाढ़ी

कण्ठः , गलः - गला

ग्रीव - गर्दन

स्कन्धः , कन्धः - कन्धा

वक्षः - छाती

कुक्षिः - कोख

उरः , हृदयम् - हृदय

मनः - मन

करः हस्तः ,पाणिः - हाथ

करतलः - हथेली

अङ्गुष्ठः - अँगूठा

अङ्गुलिः - उँगली

नखम् - नाखून

उदरः - पेट

मांसम् - मांस

त्वचा - खाल

चरणः , पादः - पैर

स्वेदः - पसीना

अश्रु - आँसू

रोमः - रोँया

तुन्दः - तोँद

तुन्दिलः - तोँद वाला व्यक्ति

नाभिः - सूँडी

जङ्घा - जाँघ

जानु - घुटना

रक्तम् , रुधिरम् - खून

अस्थि - हड्डी ।।



Thursday, April 1, 2021

NCERT Solutions for Class 6 Sanskrit Chapter 1 - शब्द परिचयः 1

 

       NCERT Solutions for

       Class 6 Sanskrit 

       Chapter 1 - शब्द परिचयः 1

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